मनुष्य का जन्म एक जीवित और चेतन प्राणी के रूप में होता है। केवल वही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाने की क्षमता रखता है। मैंने कभी ऐसा नहीं सुना कि किसी आम के पेड़ पर पपीता उग आया हो, या किसी सांप के अंडे से छिपकली निकली हो। प्रकृति एक सुनियोजित व्यवस्था पर टिकी हुई है; वह अपना नियम किसी के लिए नहीं बदलती। पर मनुष्य को ही केवल यह छूट क्यों है कि वह अपना मनचाहा कर सकता है? वह चाहे तो हाथी को गधा बना सकता है, वह चाहे तो बंदर को अपना बॉडीगार्ड बना सकता है, वह चाहे तो ऊंची से ऊंची इमारत खड़ी कर सकता है—चाहे उसके लिए उसे प्रकृति का दोहन ही क्यों न करना पड़े!

मेरा प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य की चेतना बाकी जड़ और चेतन सृष्टि से ऊंची है? क्या प्रकृति ने उसके लिए अलग से नियम बनाए हैं? अगर नहीं, तो फिर क्यों मानव की प्रवृत्ति पर किसी का जोर नहीं? क्यों वह इतना स्वार्थी है? प्रकृति मनुष्य के लिए है या मनुष्य प्रकृति के लिए?

इन प्रश्नों के उत्तर विभिन्न काल-खंडों में विभिन्न विचारों द्वारा, संतों और ऋषियों द्वारा, तथा धार्मिक शास्त्रों द्वारा विविध रूप में दिए गए हैं। लेकिन जब मैंने कई दर्शनों और धार्मिक ग्रंथों का इस दृष्टिकोण से अवलोकन किया, तो मैंने मनुष्य की इस स्थिति का मूल कारण 'अहंकार' को पाया, जो उसे एक सच्चा मानव होने की संभावना से दूर रखता है।

2. अहंकार की वृत्ति सभी मनुष्यों में समान होती है। वह तुलना करता है। समाज में ऊँच-नीच, भेदभाव, अमीरी-गरीबी, शोषण, प्रताड़ना, तथा खुद को एक छवि देने का जुनून—जैसे आदि उसके प्रपंच हैं। वह खुद को दूसरों से बड़ा साबित करने की होड़ में लगा रहता है; कभी-कभी तो वह दूसरों से छोटा महसूस करने में सुरक्षा समझता है।

वह आलसी है; मेहनत और अथक प्रयास उसके शब्दकोश में हैं ही नहीं। अहंकार ढोंगी है—वह विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न मुखौटे पहनता है। अहंकार भोगना चाहता है। वह डरा हुआ है; वह बहुत सारी वस्तुओं का संचय कर मनुष्य की शुद्धतम चेतना पर हावी रहना चाहता है। वह बेईमान है और झूठ की रोटी तोड़ता है।

वह हिंसा करता है, वह झूठ बोलता है, वह चोरी करता है, वह अत्याचार करता है और दोष लगाता है। वह केवल दूसरों को कटघरे में खड़ा करता है। वह अपनी दृष्टि में सबसे ऊँचा है और अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए सदैव आतुर रहता है।

3. अहंकार हर क्षेत्र में अव्वल आना चाहता है; उसे हारना स्वीकार नहीं है। जब कोई व्यक्ति अपनी स्थितियों से उठने की, अपना क्षितिज बड़ा करने की सोचता है, तो अहंकार—परंपराओं, मान्यताओं, बाह्य आडंबरों और अंधविश्वासों का सहारा लेकर—व्यक्ति को दोबारा बेहोशी की अवस्था में ले जाता है। वह जानवर ही बना रहना चाहता है। मानव चेतना की पराकाष्ठा उसके लिए नर्क समान है, क्योंकि ऐसे में उसे मिटना होगा, जो वह कभी नहीं चाहेगा।

अहंकार मानव चेतना की प्रखरता पर परतें जमाए बैठा है। अहंकार हर पैमाने पर तुलना करता है। वह व्यक्ति को उसकी सच्चाई से अवगत नहीं होने देना चाहता। उसके कारण मनुष्य को 'करते रहने' के इस जाल में फँसे रहने में ही अपने जीवन की सच्चाई मालूम पड़ती है। अहंकार तुलना करने की इसी वृत्ति को शरीर की इंद्रियों द्वारा संचालित करता है।

यही मनुष्य में क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, लंपटता, स्वार्थ, कठोरता, अविश्वास, निरंकुशता, लालच, हिंसा, विलास, कामवासना आदि को जन्म देता है—जिसके फलस्वरूप मनुष्य अपनी चेतना की शुद्धतम स्थिति से अनजान रह जाता है।

4. जन्म से मृत्यु तक मनुष्य अपनी चेतना की इस स्थिति से अनजान रहता है। अहंकार के इस खेल में हर व्यक्ति अपना छोटा जीवन बेहोशी में बिता देता है। व्यक्ति अपने जीवन को एक सार्थक उद्देश्य देने में असमर्थ रह जाता है; अपना समय और ऊर्जा व्यर्थ के कार्यों में ज़ाया करता है।

लेकिन अगर वह थोड़ा रुककर, परिस्थितियों की गंभीरता को समझकर, ईमानदारी से अपनी कल्पनाओं, विचारों, वासनाओं और कार्य-प्रणाली का अवलोकन करे, तो धीरे-धीरे अहंकार द्वारा निर्मित विकार और मान्यताएँ धराशायी होने लगती हैं। मिट्टी के महल दोबारा मिट्टी हो जाते हैं, झूठे सपने टूट जाते हैं। अहंकार की आग, जो इस बहुमूल्य जीवन के कारण सुलग रही थी, अब बुझने लगती है। प्रेम, क्षमा, धैर्य, सौम्यता, विनम्रता आदि सद्गुण स्वतः प्रस्फुटित होने लगते हैं।

ऐसे क्षण में मानव के जीवन में जो प्रकट होता है, वह है—"अनंत प्रकाश", जिसकी चमक के सामने सूरज की चमक भी फीकी पड़ जाती है। यह वह व्यक्ति है जो संसार के लिए ज्योति बन जाता है। यह वह व्यक्ति है जो औरों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है, क्योंकि अब उसमें अहंकार जैसा कुछ रहा ही नहीं। वह शून्य हो चुका है, वह कोमल हो चुका है, वह नवजात शिशु हो चुका है; वह अपनी नग्नता से अब नहीं शर्माता। वह नदी की सतत धारा है। वह सत्य को ज्यों का त्यों सामने रखता है। सत्य उसके जीवन का अब आधार बन गया है, सत्य उसके जीवन का केंद्र बन चुका है। वह सत्य को प्राप्त हो चुका है। वह स्वतंत्र है, उसे बाहरी आज़ादी की ज़रूरत नहीं है। वह संतुष्ट है।

ऐसा व्यक्ति जीते जी अमर हो चुका है। अतुल्य और अनुपम आयाम पर वह व्यक्ति पहुँच चुका है; मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। वह निर्वाण प्राप्त कर चुका है। वह अपने जीवन-काल में ही अनंत प्रकाश में विलीन हो चुका है। वह विनम्र हो चुका है—एक सच्चे मानव का जन्म हो चुका है।

"सब अंधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माहिं।" — कबीर

Br Christson Gill IMS

✍ Br Christson Gill IMS