गुरु की महान दया

गुरु की दया महान है, यह दया कोमल नहीं कठोर है।

यह दया शिष्य के पूर्वाग्रहों को मिटाती और उसे शून्यता के स्तर पर गिराकर उसे फिर उठना सिखाती है।

यह शिष्य को उचित राह दिखाती और उसे सही दिशा में बढ़ते रहने की नित्य प्रेरणा देती है।

गुरु की दया महान है,
यह दया कोमल नहीं कठोर है।

यह शिष्य की उच्चाकांक्षाओं को चंचल होने से बचाती और चरित्र निर्माण की आधारशिला बन जाती है।

यह शिष्य की दैनिक औषधि है जो उसमें ज्ञान की ऊर्जा का संचार करती है।

गुरु की दया महान है,
यह दया कोमल नहीं कठोर है।

यह शिष्य के चरित्र निर्माण में अहम भूमिका निभाती और उसे ज्ञान के उच्चतम स्तर (सत्य बोध) पर पहुँचाती है।

यह शिष्य को आत्मबोध तक ले जाती और उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

अज्ञानता से ज्ञान तक की सीढ़ी तैयार करने वाली गुरु की महान दया कोमल नहीं, कठोर है—स्वभाव में नहीं, अपितु भाव में।



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